Monday, April 26, 2010

Wednesday, April 14, 2010

सात समुन्दर पार -कमलेश चौहान - ज्ञान दर्पण -रतन शेखावत

चंडीगढ़ के यूनिस्टार पब्लिकेशन ने "सात समन्दर पार " हिंदी उपन्यास प्रकाशित किया है जिसे लिखा है अमेरिका में रहने वाली भारतीय महिला कमलेश चौहान ने

कमलेश चौहान पंजाब साहित्य सभा द्वारा प्रेस्टीयस एन आर आई एकेडमी अवार्ड जनवरी २००९ से भी सम्मानित है


उपन्यास अमेरिका में रहने वाले एक एनआरआई से शादी करने वाली महिला के जीवन की सच्ची घटना पर आधारित है
इस उपन्यास की मुख्य किरदार सुन्दरी नामक एक महिला है
साधारण परिवार में जन्मी सुन्दरी स्वतंत्र विचारों वाली ,बहादुर,चतुर ,वाक्पटु और सुन्दर महिला है
अपनी दो बहनों की शादी के खर्च के वित्तीय बोझ से दबे परिवार पर सुंदरी कभी बोझ नहीं बनना चाहती इसीलिए वह अपनी शादी की बजाए अपनी पढाई को प्राथमिकता देती है साथ ही गलत सामाजिक अवधारणाओं के खिलाफ आवाज उठाती है
सुन्दरी आकाश नाम के एक लड़के जिसे वह अपने सपनो का राजकुमार समझती है से बेइन्तहा प्यार करती है लेकिन उसके इस प्यार के रिश्ते को उसके घर वाले कभी स्वीकार नहीं करते और उसकी शादी एक एन आर आई से कर दी जाती है
अपने परिवार की आर्थिक व सामाजिक परिस्थितियों के चलते सुन्दरी उस एनआरआई से शादी कर लेती है और इस तरह शुरू होती है सुन्दरी की सात समंदर पार यात्रा


सुन्दरी एक पढ़ी लिखी महिला होने के बावजूद उसे महसूस कराया जाता है कि वह विदेशी वातावरण के लायक नहीं है उसका पति उसे अहसास करता है कि वह सामाजिक तौर पर उसकी बराबरी की नहीं है और वह उसकी भावनात्मक व वास्तविक इच्छाएँ कभी पूरी नहीं करता
वह हमेशा अपनी नौकरानी की तरह आज्ञाओं का पालन करवाना चाहता है लेकिन सुन्दरी इन सबके खिलाफ आवाज उठाती है और अपना एक अलग अपने खुद के उसूलों वाला व्यक्तित्व तैयार करती है
वह विदेशी कानून की मदद से तलाक़ लेकर खुद को अपने पति से अलग कर लेती है और समाज में अपनी पहचान बनाने का संघर्ष शुरू करती है इसी संघर्ष को इस पुस्तक में उकेरा गया है
इसके अलावा इस पुस्तक में भावनात्मक विषयों को छुआ गया है
जो भारतीय महिलाऐं शादी करके पश्चिमी देशो में पंहुच हिंसा, भावनात्मक व शारीरिक शोषण का शिकार बनती है उनके अनगिनत किस्से इस पुस्तक में संजोये गए है
और शोषण का शिकार बनी महिलाओं को उपन्यास के माध्यम से उनके अधिकारों से परिचित कराना व उनकी शक्ति को बढ़ाना है


उपन्यास में एक नारी के अरमानो व भावनाओं कोप गंभीरता से दर्शाने का प्रयत्न किया गया है
उपन्यास की किरदार सुन्दरी अपने प्यार से वंचित हो एक प्रेमरहित विवाह करती है ताकि वह अपने परिवार की वित्तीय सहायता व सामजिक प्रतिष्ठा बना सके लेकिन लेकिन इन प्रेमरहित बांहों के दलदल से निकलने के लिए वह जो संघर्ष कर एक ऐसी नारी बनती है जो समाज में अपना एक अलग निशान छोड़ती है




कमलेश चौहान एनआरआई से शादी करने के चक्कर में ठगी गयी भारतीय महिलाओं पर एक और उपन्यास लिख रही है " धोखा सात फेरों का "

Thursday, April 1, 2010

हम रूठना भूल गए : लेखिका कमलेश चौहान Copy rights with kamlesh Chauhan

हर मौसम आया हर मौसम गया

हम भूले ना आज तक कोई बात

हम भूले ना तेरा मधुर  पियार

दिल ने माना तुम्हे ही दिलदार

तेरा हमारे रूठने पे यह कहना

भल्ला लगता है तेरा मिजाज़ चुलबला

जब हमारा किसी से बात करना

सुना करते थे तुमसे ही तुम्हारे दिल का डरना

हम पूछते थे कियों करते हो हमारे प्रेम पे शक

जवाब था तुम्हारा भरोसा है मुझ पर

नहीं करता मेरे दिल नादाँ पे कोई शक


लेकिन यु आपका हमारे आजाद पंछी दिल को कैद करना

हमारा दिल समझ न सका आपका इस कदर दीवाना होना

जब आई तुम्हारी बारी पराये लोगों से यु खुल कर बात करना

हम सोचते आप भी सीख जायोंगे प्रेम दोस्ती मे अंतर करना

हम खुश होते तुम सीख रहे हो गैरो से दोस्ती करना

हमारे दिल की कदर करोगे क्या होता है समाजिक होना

यह क्या हुआ यह कै़से रुख बदला तुमने अपना


गैरो की बातो मे हकीकत पाई तुमने हमारी वफ़ा भूल गए

मौसम भी कुछ वक़त लेता है बदलने में

सर्दी गर्मी घडी लेती है रुत बदलने में

यह किस कदर रास्ता हमारा भूल गए

इतनी जल्द कियों रंग बदल गया तुम्हारा

नियत ने बदसूरत किया चेहरा तुम्हारा

हम बैठे रहे दहलीज़ पर तेरी इंतजार मे

बिखरा दिये राहो की बेदादगरी ने

जो भूल बिखारे थे मेरे हाथो ने

जब रूठ कर माँगा हमने अपना हक

बरसा दिये तुमने अंगार भरे लफ्ज़

आंखे रोई पर ना सोयी रात भर

तेरी ख़ुशी पे भटका था मेरा सफ़र



वोह नज़र बरस जाती थी हमारी याद में

अब ज़हर है कैसा तुम्हारी उस नज़र मे

वोह तुम ना थे जो आंसू चुराए तन्हाई के

मालूम ना था बरस गया है धुआ कब से


तेरी बेरुखी से यह अशक निलाम हो गये

मेरे अशकों से तेरी यादो के दिये बुझ गये

तुझे क्या पता औ बेवफा अंग है बर्फ मेरे

ना आयुंगी कभी तेरे दर पे बुलाने तुझे

की हम तुझ से रूठना भूल गये

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