Thursday, January 14, 2016

एक तन्हा सा लम्हा : लेखिका कमलेश चौहान (गौरी )

एक  तन्हा सा लम्हा :  लेखिका कमलेश चौहान (गौरी )

गहरे सागर  की तरह थामकर खामोशियो का आँचल  ऐ  दिल  तू बहता  जा ,
डूबकर  गहराइयो के पर्दो में   छुपा कर  दरदे - दिल  को यु  गुन गनाता  जा। 

भूले से ज़ाहिर न कर देना  क्यों बेवज़ह  तन्हा दिल रात दिन  उदास रहता है ,
पुछे कोई वज़ह  जब  उदासियों की यू ही हसकर  ज़माने को भरमाता   जा। 

मत कहना भूले  से भी  , रिवाजों की तंग गलियों में , खो गया था तेरा प्यार 
 उमर की लकीरों में कोई दिलदार ही न मिला , हर सवाल  को टालता  जा। 

दिनभर लगा कहकहे , तन्हाईयो की काली रात में खामोश ऑंसू बहा लेना ,
दो कदमो की आहट हो जब दुनिया वालो की , यकदम आँसू पोछता जा। 

ज़िन्दगी के ऐसे  मोड़ पर   करके झूठे वादे   इस कदर  हर दोस्त रुस्वा हो गया ,
 ऐ मेरे बिछड़ने वालों करू कैसे बयान अब हमारा तो हर लम्हा तनहा हो गया। 


"मेरे आलोचक मेरे दर्शक है।  कृपया  आप हमारी सादगी भरी कलम की लेखनी की आलोचना कर सकते  है। "

Please do not manipulate, exploit any thought of this poem , In any form of this poem. Legal action will be taken . Copy right@ Kamlesh Chauhan (Gauri) 








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