Sunday, January 10, 2016

हम विक्रम बदौरिया जी के बहुत धन्यवाद करते है । जिन्होंने हमारे सात जनम के बाद भाग पहला तथा दूसरे भाग के लिए हमारे उपन्यास की समीक्षा की. .

हम विक्रम बदौरिया जी के बहुत धन्यवाद करते है ।  जिन्होंने हमारे  सात जनम के बाद भाग पहला तथा दूसरे भाग के लिए हमारे उपन्यास की समीक्षा की. . 

कमलेश चौहान “गौरी" भारत के कश्मीर में जन्मी, पंजाब व लखनऊ और फिर इंदौर में पली बढ़ी, यह यूनानी संगमरमर की प्रतिमा सी छवि लिये सरल ह्रदया लेखिका कमलेश चौहान “गौरी" सत्तर के दशक में “ सात फेरों " के फेर में पड़ी और “सात समंदर पार " कर अमेरिका जा पहुँची .....जहाँ समय के उदधि में अन्यमनस्क सी तैरती , लहरों के थपेड़े खाती शैवाल सी  ,यह “head of the class "       की सिने तारिका “ आम्बी दा बूटा " और “ अनारकली " के नाट्य मंचों पर अपनी अभिनय प्रतिभा का आलोक विखेरती  यह नाट्य कला प्रवीणा अभिनेत्री , व नारी ह्रदय की कुशल चितेरी विदुषी महिला  आज एक लब्ध प्रतिष्ठ उपन्यासकारा ही नहीं वल्कि नारी ह्रदय की जलन पर शब्दों का मरहम लगाती  एक ख़ूब सूरत भावुक ह्रदया कवियत्री भी है ।
यही कारण है कि कमलेश चौहान “ गौरी " के उपन्यास लेखन की काव्य मय शैली वांगला भाषा के कालजयी व मूर्धन्य उपन्यासकार शरत चन्द्र व वंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय की कवित्व मय लेखन शैली की वरबस याद दिलाती है, जहाँ  उपन्यास कार का कवि ह्रदय अपने पात्रों के साथ उनके दु:ख में और उनके सुखों के साथ भी वार वार गा उठता है ,, लेकिन जहाँ शरत चन्द्र की नायिकायें उनके गरिमा मयी भव्य व्यक्तित्व और आदर्शों से महिमा मण्डित हैं , वहीं कमलेश चौहान के उपन्यासों की नायिका एक आम  स्त्री है जो समय के समंदर में लहरों के थपेड़े खाती शैवार सी वहती रहती हैं पर उसकी उत्कट जिजीविषा उसे डूबने नहीं देती , मरने भी नहीं देती । वह घोर संकट के समय में भी , भीगी पलकों के साथ भी गा उठतीं है , सतायें जाने की पराकाष्ठा होने के बाद भी वह त्याग मयी क्षमा की प्रतिमूर्ति बनी रहतीं ह और आतताई को अंततः क्षमा कर देती है ।
    कमलेश चौहान “ ग़ौरी" का प्रथम उपन्यास “ सात समुन्दर पार " । जो उन्होंने मुझसे छुपा कर गुप चुप लिखा था  , कुछ वहका वहका सा अन्दाज़ लिये हुये है , पर दूसरा उपन्यास “ सात फेरों से धोखा " के फ़ुट नोट्स वह मुझे बराबर भेजतीं रहीं ,यह उनका सौजन्य और मेरा सोभाग्य था कि मुझे उनके इस महान उपन्यास की प्रथम प्रतिकृति के अवगाहन का अवसर मिल सका ।
“ सात फेरों से धोखा "  पारिवारिक हिंसा  की पृष्ठभूमि पर हिन्दी व अँग्रेजी में लिखा गया एक अप्रतिम और एक ऐसा उपन्यास है जिसे भारत व अमेरिका के हिन्दी व अँग्रेजी व समाज शास्त्र विषयों की उच्च कक्षाओं के पाठ्य क्रमों में एक शोध प्रवंध की तरह  शुमार किया जा सकता है
    आज की इस लब्ध प्रतिष्ठ उपन्यासकारा प्रवासी पँछी का लिखा यह तीसरा उपन्यास “ सात जन्मों के बाद " को पढ़ने का सौभाग्य मिला  यह एक सच्ची पुनर्जन्म की घटनाओं पर आधारित प्रेम गाथा का वहुत ही रोचक ढ़ग से बुने गये ताने लाने का कथा प्रवाह है जो आदि से  अंत तक पाठक को बाँधे रहता है । उपन्यास के कथानक पर अमरीकी वर्णनात्मक शैली व भारतीय यात्रा वृतांत पद्धति के ख़ूबसूरत मिश्रण के साथ राजपूताना लाइफ़ स्टाइल  की “ केशर कस्तूरी " शराब का नशा लेखिका और पाठक दोनों के सर पर चढ़ कर बोलता है ...........!
यह नशा और गाढ़ा होकर लेखिका की क़लम को शोहरत की स्याही से सराबोर करता रहे यही कामना है ।  एवमस्तु  । इति ।


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