Monday, February 28, 2011

जैसे कुछ हुआ ही नहीं !! - पंकज त्रिवेदी All rights Reserved with Pankaj Trivedi

जैसे कुछ हुआ ही नहीं !! - पंकज त्रिवेदीby Pankaj Trivedi on Monday, February 28, 2011 at 8:35pm


लोगों की भीड़ को

चीरती हुई तुम्हारी दो आँखे

जब देखती है मुझे तो

लोगों की भीड़ की सभी आँखें

एक ही शख्स पर तरकश से निकले

ज़हरीले तीर की तरह

चुभने लगती है मुझे और
लहूलुहान कर देती हैं मेरी संवेदना को....

और मेरा कलेवर

सहता है चुपचाप हमेशा की तरह !

ऐसा क्यूं होता है कि -
लोगों की नज़रें

तीर की नोंक बन जाती है फिर भी

मैं तुम्हे देखता रहता हूँ,

जैसे कुछ हुआ ही नहीं...!!

Sunday, February 27, 2011

हवाएँ - पंकज त्रिवेदी-- All rights reserved with Pankaj Trivedi

करता हूँ तुम्हें प्यार तो, जलती है यह हवाएं

लोग भी यहाँ क्यूं जलने लगे, लगती है हवाएं

बात मन की है सुनो, जाती है यूं ही दूरतलक

लोग भी कितने अजीब है, कहती यह हवाएं

समझना चाहता था, तुम्हें जिंदगीभर के लिएँ
न पार कर पाया दहलीज़ भी, लगती थी हवाएं

ममनून हूँ तुम्हारा, जो सिसककर सह रही थी

क्या जानो प्यार को तुम भी, लगती हैं जो हवाएं





Thursday, February 24, 2011

Trial Time Written by Kamlesh Chauhan Copyright@2002 Kamlesh Chauhan

TRIAL TIME
Kamlesh Chauhan
Copyright@2002
We should not expect anything from love one in revert
As we say

If there is true love, it will come back to you

But without belief where the relationships

Stay?

Is it asking for legitimacy is too much to ask

Or its self-absorbed thought?

All I wanted Him to be loyal

Is this too much to ask?
All I wanted him to be aware of his neighbors’’

Is this too much to seek?

Until he does not come to benevolent
I will keep my peace
I need to go away under the state of affairs

I heard aloofness and absence make us

Long for each other more

But I find that conflicting

My circumstances made him to hide and trick

Yes! He loved me as long as he could

Until he set up himself enthralled in fallacy
He became trendy in the la la land
He was more in demand

So he decided to be cagey
He became callous and ferocious to my desires

Why would he have to face the world for me?

Why he has to combat for my honor?

While he get attention from the world

His sincerity nebulous and he became more

Loyal to the one who were sham
He set his bond with secretive names

He was delighted by the secretive fames

I found my self in shocked Deposit

His heart became like a gigantic sky

I became Night and he became a day


This Poem is dedicated to those who have to deal with friends who change with in a blink of eyes and no where to found when true friend needs at the time of their trial time.

I wrote this poem when my dearest father who had helped many people in his life while those relatives, no where to found at the time of his Last stage of his Karma. He was lucky to have good family and his children who respected him and try to follow the ethics and moral he had in his life. He loved his country India and had great honor for both India and America. At the last stage of his life he wanted his body should be covered with both Flags India and America. You are always with me Dad. You are my guiding light dad. I love you.



****Nothing should be manipulated and exploited from this poem all rights are reserved with Kamlesh Chauhan.****



Monday, February 21, 2011

वोह निकला चाँद पूरनमाशी का लेखिका : कमलेश चौहान (गौरी )

वोह  निकला  चाँद पूरनमाशी का  

लेखिका : कमलेश  चौहान  (गौरी )

Copyright@2011

खिड़की  में  खड़ी  कुछ यु  ही ताने बाने  बुन रही थी
बार बार गुजरे लम्हों की  परछाईया  तले खोयी थी

वोह समुंदर का किनारा यहाँ हम  साथ साथ चले थे
मुलाकातों के दामन में आँखों में नशा कुछ तबसुम थे

आज कुछ ऐसा आलम है तू नहीं तेरी यादे पुकारती है
गुजर जाती है सुबह हर शाम जुबान तुझे आवाज देती है

दीवारों को तनहाई  में तुम्हारी पुरानी बाते  सुनाती हु 
धुप में देख अपना ही साया कल की  बात कहती हु

                  सुनी मेरे चाँद ! कल रात की बात

आह ! कल निकला गज़ब का असमान में पूरनमाशी का चाँद था
आँखों में छाया तेरे नाम का खुमार, जिस्म में अजीब सा तनाव था

तुम तो कहीं दूर थे , पर तुम क्या जानो  वोह  चाँद धरती के बहूत  करीब था
ख़ामोशी से जुबान कह उठी , उफ़ ! दुनिया बनाने वाले  तेरी कुदरत का कमाल था

फिर उभरा सीने में  भुला बिसरा  दर्द , फिर आयी  वोह पूरनमाशी की रात की याद 
जिस रात तुने  सुनाया  मज़बूरी का साज ,टूट गया हमदोनो का सुहाना  खवाब

चांदनी रातो में यु रो  कर, मुझे  यु झूठी  तसली दे कर,  तुम मुझसे जुदा हो गए थे
अपने दामन से तेरी  आँखों के आंसू पोषती  रही , तुम जब  दूर अन्धेरो में खो गए थे

पूरनमाशी की रात आज भी है , मेरी आँखों में  वोह नमी आज भी है
तू नहीं है मेरे पास तेरी आँखों में छलकते आंसुवो की तस्वीर आज भी है










Tuesday, February 8, 2011

Sunil Malikbhai Sonu ki Contrubuation _ Na Socho Apnae Pran KI

Sunil Malikbhai Sonu February 8 at 1:08pm Report


विश्व एकता के सम्मुख ना सोचो अपने प्राण की।

बात करो अब हमसे केवल मानव के कल्याण की।।


तम को धर से दूर करो अब पट खोलो किवाड़ की।

सीमाओं को खत्म करो अब बात करो ना बाड़ की।।

ना हो विषमता ना हो बन्धन ना हो सीमायें जिसमें।

मिल जुल कर प्रयास करो उस नव युग के निर्माण की।।


बात करो अब हमसे केवल मानव के कल्याण की।।

अब तो त्याग करो श्रंखला विजयों के अभियान की।

ध्वनियां तुम तक भी पहुचेगी मानवता के गान की।।

साथ हमारे अगर तुम्हे भी शान्ति दूत बन पाना है,

बन्द करो अब पूजा तुम भी भाले और कृपाण की।।

बात करो अब हमसे केवल मानव के कल्याण की।।

अहंकार को छोड़ो कुछ ना कीमत है अभिमान की।

हिल मिल कर अब तुम भी सोचो मानव के सम्मान की।।

लालच में तुम फंसे रहोगे ना इसमें कुछ रक्खा है,

कोशिश करके देखो राहें पाओगे निर्वाण की।।

बात करो अब हमसे केवल मानव के कल्याण की।।


नहीं सुनाओ अब तुम गाथा मानव के संहार की।

दिल में ज्योति जलाओ तुम भी प्यार भरे संसार की।।

जब तुमको है ये लगता सब जीवन एक समान है,

फिर क्यों अलग उपाय हो करते अपने जीवन त्राण की।।

बात करो अब हमसे केवल मानव के कल्याण की।
Copyright @ Sunil Malikbhai Sonu

Sunday, February 6, 2011

Contribution of Writer nPoet Satyaprakash Tyagi _ Mai Patali Si Dhar

Satyaprakash Tyagi February 5 at 5:36pm Reply• Report


मैं पतली सी धार नदी की गहराई को क्या पहचानूँ !

मेरे अंतर प्रेम ,ह्रदय के कुटिल भाव को मैं क्या जानूँ !



वैसे कहते लोग कि मैने,

चीर दिया धरती का आँचल ,

मुझ से ही है जीत न पाया ,

कोई गिरिवर या कि हिमांचल ,

अम्बर पर छाये टुकड़ों में

चीर दिए हैं मैने बादल,

हर प्राणी कहते उत्सुक हैं

सुनने को मेरी ध्वनि कल कल

पितृ गृह से जब निकली थी

धवल बनी कितनी ,कितनी थी निर्मल

बढ़ता गया गरल ही मुझसे

माना पछताई में पल पल

आखिर मुझको ले ही डूबा

लगता है जो सागर निश्छल

ह्रदय दग्ध दिखलाऊँ किसको ,किसे पराया अपना मानू !

पथ साथी सब मिले लुटेरे

मान के प्रेमी गले लगाया

दोनों ही हाथों से लूटा

तन मन अन्दर जो भी पाया

सबने मुझको किया लांछित ,

देख जगत को मन भरमाया !

मैने सबके पाप समेटे

जो भी जितना संग ले आया

अस्तित्व मिटाया मैने अपना

तभी सिन्धु ने गौरव पाया

सुनी व्यथा पर दर्द न जाना ,

बोलो कैसे व्यथा बखानूं !!
Copyright@Satyaparkash Tyagi

Thursday, February 3, 2011

Significance of Colors: Contribution of Suresh Sharma

Poem: Significance of Colors


Rainbow is so beautiful to behold,
Presenting a panoramic view manifold.
Colors represent many hues of Life,
Some are light while others are bright.

The white is representative of harmony and peaceful sentiments,
The Red represents its valiant and fighting nature & fire elements.
The Green represents environmental purification and an agent of climate change.
The Blue reflects the purity and transparency in oceanic shades,
And Yellow is a color of Life Vibrancy and merriment trade.


Orange is the color of Blissful spirituality,
Where conscience is reflected in its true reality.
Black is the color of sacrifice and sadness,
Representing the bereavement and darkness.

The Golden is the color of enlightenment,

Full of glory, richness and fulfillment.

Thus our Life is amalgamation of many colorful states,

Some may be bright and some represent dark and sad state.

Let us fill our life with bright colors,

and share our sorrows all together.

Copyright: Suresh Chander Sharma







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Wednesday, February 2, 2011

Rajiv Bhatnagar Special Contribution

Cling to hope, hold it dear to me,


Treasured as a tree hold for rain

And as my heart regards you.

I hold to hope, that believes

...Though the time uncertain,

My eyes will again see who my heart feels.

I hold onto hope, that knows

Even do my dreams hear no place

Within the heart I reach for,

Still where I feel you I have

Some part of your existence.

Until it cannot, hope guides me,

The hope of feeling your heart

Beating close to mine.
Written by : Rajiv Bhatnagar