Posts

Jana Tha Humse Door Bahane Bana Liye-Lata Mangeshkar-Adalat

ऐ ! पडोसी लेखक : कमलेश चौहान : All rights reserved with Kamlesh Chauhan 2010

ऐ ! पडोसी , सुन गौर से मै हंसू या रोयू तेरी इस नादानी पे बोल सर झुका दू या सर को छिपा लू तेरी इस बेईमानी पे अफ़सोस ! न आया तुझे न भाया तुझे जीना कभी अमन से न जीने दिया भारत को, न तुझे खुद आया जीना कभी चैन से तेरे रग रग मे तेरे ज़ेहन में जिस कदर छाह चुकी है ईर्ष्या इस कदर घर बना चुकी है तेरे भाजुओ मे शैतान की हिंसा भिखारी बन के विशव में तू मांगता है एक ज़हरीली खुनी कमान खबर ले वतन की गरीबो की, नहीं मिलता उन्हे कपड़ा रोटी मकान फिर भी न जाने कियों तुने पहन रखा है नफरत का लिबास भटकाता है मासूम नौजवानों को पहन कर मज़हब की निकाब कश्मीर पे किया यु तुने हब्शी सा अत्तियाचार, तेरा ही किया ये पाप तेरा मज़हब तेरा खुदा मांगेगा तुझ से ही तेरे इस जुलम का हिसाब असमान पे, धरती पे , तेरे घर से तेरे जिगर से तुझे अपनी ही चीखे सुनाई देंगी कश्मीर भारती की एक एक लाश तुझे न चैन से मरने देगी न जीने देंगी ओह ! पडोसी बात कर ,ध्यान कर इधर आ जरा सुन कान कर अनसुनी मत कर, भूल मत यह बात अपने खुदा की याद कर पन्ना पन्ना इतिहास का बन कलम तलवार तेरी हरक़त लिखेंगा आने वाली तेरी पीड़ी का हर अंश ...

Hum Do : Abhi Na Jao Chhod Kar Ke Dil Abhi Bhara Nahi

Akeli Mat Jaiyo - WO JO MILTE THE KABHI - Lata

Baharein Phir Bhi Ayegi Magar Hum Tum_Lata in Lahore

Neeraj Tyagi Contribution to my Blog

Neeraj Kumar Tyagi May 16 at 8:31pm Reply मैं पतली सी धार नदी की गहराई को क्या पहचानूँ ! मेरे अंतर प्रेम ,ह्रदय के कुटिल भाव को मैं क्या जानूँ ! वैसे कहते लोग कि मैने, चीर दिया धरती का आँचल , मुझ से ही है जीत न पाया , कोई गिरिवर या कि हिमांचल , अम्बर पर छाये टुकड़ों में चीर दिए हैं मैने बादल, हर प्राणी कहते उत्सुक हैं सुनने को मेरी ध्वनि कल कल पितृ गृह से जब निकली थी धवल बनी कितनी ,कितनी थी निर्मल बढ़ता गया गरल ही मुझसे माना पछताई में पल पल आखिर मुझको ले ही डूबा लगता है जो सागर निश्छल ह्रदय दग्ध दिखलाऊँ किसको ,किसे पराया अपना मानू ! पथ साथी सब मिले लुटेरे मान के प्रेमी गले लगाया दोनों ही हाथों से लूटा तन मन अन्दर जो भी पाया सबने मुझको किया लांछित , देख जगत को मन भरमाया ! मैने सबके पाप समेटे जो भी जितना संग ले आया अस्तित्व मिटाया मैने अपना तभी सिन्धु ने गौरव पाया सुनी व्यथा पर दर्द न जाना , बोलो कैसे व्यथा बखानूं !! By Poet Satyaprakash Tyagi

Reshma-aankhiyaan nu